सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को जोड़ने वाले 42वें संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि संसद को प्रस्तावना में संशोधन का अधिकार है और यह संविधान का अभिन्न अंग है। यह भी स्पष्ट किया गया कि इतने वर्षों बाद इस संशोधन को चुनौती देना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए ‘समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाएं सोमवार को खारिज कर दी। कोर्ट ने 42वें संविधान संशोधन के जरिये प्रस्तावना में जोड़े गए इन दोनों शब्दों को 44 वर्ष बाद चुनौती दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने समय बाद चुनौती देने का कोई न्यायोचित आधार नजर नहीं आता। याचिका पर विस्तार से विचार करने की जरूरत नहीं लगती।
कोर्ट ने कहा कि संविधान को अपनाने की तिथि अनुच्छेद 368 के तहत सरकार की शक्ति को कम नहीं करेगी और इसके अलावा इसे चुनौती भी नहीं दी जा रही है। उसने कहा कि संसद की संशोधन करने की शक्ति प्रस्तावना पर भी लागू होती है। शीर्ष अदालत ने कहा, ‘इतने साल हो गए हैं, अब इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है?’
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए ‘समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग वाली याचिकाएं सोमवार को खारिज कर दी। कोर्ट ने 42वें संविधान संशोधन के जरिये प्रस्तावना में जोड़े गए इन दोनों शब्दों को 44 वर्ष बाद चुनौती दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने समय बाद चुनौती देने का कोई न्यायोचित आधार नजर नहीं आता। याचिका पर विस्तार से विचार करने की जरूरत नहीं लगती।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि संविधान में संशोधन का अधिकार संसद के पास है और संविधान में संशोधन की संसद की शक्ति प्रस्तावना पर भी लागू होती है।